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माहवारी - पांच साल तक सबसे छुपाना

"मुझे माहवारी शुरू हुई जब मैं 13 साल की थी, लेकिन मैंने पांच साल तक इस बारे में अपनी परिवार में किसी को भी नहीं बताया," अनीता कहती है।

अनीता की माँ को उसकी माहवारी के बारे में उसकी शादी से कुछ दिन पहले ही पता चला। तब अनीता 18 साल की थी।  "मुझे नहीं लगता की उन्हें मेरी माहवारी में जानने की कोई ज़रूरत थी इसलिए मैंने उन्हें नहीं बताया, और जब उन्हें पता चलना तो चल ही गया," अनीता कहती हैं। 


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नियंत्रण महिलाओं के हाथ में

यमला पगला दिवाना अनंतकाल से पुरूषों को प्रतिबद्धता से बचने वाला और हर घड़ी सिर्फ सेक्स के बारे में सोचने वाला माना जाता है। लेकिन क्यों?

क्या हमें प्रकृति ने ऐसा ही बनाया है? क्या महिलाएं अपने पक्ष का बचाव बेहतर रूप से कर पाती हैं? या ये मिथक है कि हम पुरूष अपने आपको रंगीन मिज़ाज़ कहलवाना पसंद करते हैं? मेरी राय में जवाब इन तीनों का मिश्रण है।

लेकिन अब समय बदलता हुआ प्रतीत हो रहा है। महिलाएं अब पुरूष वर्चस्व को खुलेआम चुनौती दे रही हैं। इसके लिए वे नव उदारवादिता और नारीवादिता जैसे मुद्दों का प्रयोग कर रही हैं। परिणामस्वरूप — मेरे तीन प्रकार के दोस्त हैं, प्यार में डूबे हुए, दिलजले और समलैंगिक

कठपुतली के कलाकार

करीना और इमरान की हाल ही एक फिल्म 'एक मैं और एक तू' भारतीय प्रेम संबंधों के अनाकर्षक सोच को और स्वतंत्र महिला और कमजोर मर्द वाली छवि को उजागर करती है, ऐसे परिवेश में, जहां मर्दो की हर जरूरत पूरी किये जाना महिला का कर्तव्य नहीं समझा जाता।

पहले की अपेक्षा में आज महिलाओें का वह व्यवहार अब सहज माना जाता है जो असल में पहले सिर्फ पुरूषों की जागीर हुआ करता था। नहीं सचमुच, महिलाएं यदि सेक्स के बारे में बात करें तो उन्हें स्वतंत्रतावादी माना जाता है, और यदि पुरूष ऐसा करें तो उसे गंदी सोच समझा जाता है। चाहे इसे नियंत्रण लेना समझे या भावनात्मक हेरफेर, मैंने ये म​हसूस किया कि महिलाएं बेहतर कठपुतली कलाकार हैं।

बकबक

मेरा अपना इस बारे में हाल ही का अनुभव रहा है। और आप तो जानते ही हैं कि मैं मनगढंत कहानियां नहीं बताता। लेकिन मेरा एक दोस्त है जिसकी महिला मित्र उसे शादी के बंधन में बांधने के लिए मजबूर कर रही थी।

कुछ दिन पहले उसे पता चला कि वो उसके अलावा दो और पुरूषों के साथ ऐसा कर रही थी और तीन में से दो राजी हो गये थे। लेकिन वाह रे फेसबुक, उस लड़की का सच सामने आ गया। इस रिश्ते का अंत हुआ कुछ लोगों के लिए हंसी ठिठोली का सबब और शराब की दुकान वाले के लिए काफी अच्छी बिक्री के साथ।

खेल

ये सब कोई अनूठा नहीं। दुर्भाग्यपूर्ण सत्य ये है महिलाओं को ये मालुम होता है कि हम आसान शिकार हैं। ज्यादातर पुरूष इस खेल में दक्ष नहीं होते।

आखिरकार हम सभ्य भारतीय परिवारों से हैं जहां सेक्स के बारे में खुलकर बात नहीं की जाती। अधिक से अधिक टीवी पर कार्यक्रम देखकर ही हम जानकारीयां जुटाते हैं। तभी तो हम में से अधिकतर लोग जोइ से ज्यादा रोस्स के निकट महसूस करते हैं।

डरा कर भगाना
और ये भी सच है कि हम से बहुत से लोग महिलाओं के पीछे पीछे भागते हैं, फोन करना, बीबीएम, फेसबुक के जरीए या आपस के मित्रों के मित्रों की मदद से। और उसका परिणाम होता है — कुछ नहीं।

एक और सच्ची कहानी। एक महिला ने मेरे 'मजनू' दोस्त को अपनी दोस्तों की एक पार्टी में बुलाया। वो घुटनों के बल भागता हुआ पहुंचा। क्यो? उसे लगा कि उसके मित्रों ने उस लड़के को नर्वस कर भगा दिया हो लेकिन 'मजनु' को समझ ही नहीं आया कि उस लड़की का क्या कारण जो दिलचस्पी ले रही है। शायद पीछे भटकाने का भी अपना ही सुख है, चाहे परिणाम जो भी हो।

कठपुतली

मुझे गलत मत समझिए लेकिन मैं कुछ कातिलों को भी जानता हूं (कम से कम खुबसूरती के डिपार्टमेंट में)। वो पुरूष जिन्हें सड़क पर गुजरती हर महिला पलट कर देखती है। लेकिन क्या वो हेरा फेरी कर पाते हैं? अधिकतर नहीं।
तो क्या हम ऐसा करना बंद करेंगे? क्या हम महिलाओं के आगे घुटने टेक देंगे? क्या हम खुद को कठपुतली मान लेंगे? नहीं, कभी नहीं, बल्कि हम और मेहनत से उनका पीछा करेंगे। क्योंकि हम पुरूष वही करेंगे जो हमें करना है।

आखिर में भी ये लेख किसी लड़की का दिल जीतने के लिए ही लिख रहा हूं।

लेख: कुबेर शर्मा

फोटो: कुबेर शर्मा, © लव मैटर्स/RNW

इस ब्लॉग में व्यक्त किए गये विचार RNW के भी हों, ये आवश्यक नहीं।

क्या आप कुबेर से सहमत हैं? फेसबुक पर कमेंट छोड़ कर इस चर्चा का हिस्सा बनिए।

और — यमला पगला दिवाना

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