रिश्ते में ईर्ष्या की खास वजह असुरक्षित महसूस करना है। आगें पढें।
माहवारी - पांच साल तक सबसे छुपाना
"मुझे माहवारी शुरू हुई जब मैं 13 साल की थी, लेकिन मैंने पांच साल तक इस बारे में अपनी परिवार में किसी को भी नहीं बताया," अनीता कहती है।
अनीता की माँ को उसकी माहवारी के बारे में उसकी शादी से कुछ दिन पहले ही पता चला। तब अनीता 18 साल की थी। "मुझे नहीं लगता की उन्हें मेरी माहवारी में जानने की कोई ज़रूरत थी इसलिए मैंने उन्हें नहीं बताया, और जब उन्हें पता चलना तो चल ही गया," अनीता कहती हैं।
Guy next doorहस्तमैथुन एक बेहतर समाज के लिए
मैं गुमनामी से बाहर आ रहा हूँ। मैं हस्तमैथुन करता हूँ और मुझे कोई शर्मिंदगी नहीं है।
हस्तमैथुन के आनंद से मैं अचानक क दिन रूबरू हो गया। 'विस्मय', 'अद्भुत', और 'आजादी' जैसे शब्दों से उस पल और उस एहसास की यादें जुडी हैं। और मासूमियत से मैंने फ़ौरन ही सोचा की, ना जाने क्यूँ यह प्रक्रिया बदनामी में दबी पड़ी है।
मुझसे बड़ा मर्द कोई नहीं
मुझे भी मर्दानगी की होड़ में आखिरकार शामिल होना ही पड़ा, जहाँ लड़ाई आखिर किस बात की है, यह कोई नहीं जानता।
हम में से बहुत से लोग अक्सर एक दूसरे के साथ अपनी मर्दानगी को लेकर स्पर्धा करते ही रहते हैं। और इसका सबसे आम उद्धरण अक्सर सड़क के यातायात के ज़रिये प्रदर्शित होता है। कुचलने वाले ट्राफिक और ऐसी ही नयी नयी परिस्तिथियों के बीच में कार चलाना सीख रहा हूँ।
फेसबुक दर्शनरति
अपने किशोरावस्था के दिनों में, मैं अकेला ही लड़का था जिसका कोई अफेयर नहीं था, और सच कहूँ तो मुझे दूसरों से बहुत इर्ष्या होती थी।
जब मैंने स्कूल ख़त्म किया, मैंने सोचा नहीं था की मैं इन लड़कों से दोबारा कभी मिलूँगा। लेकिन मैं उन सभी लड़कियों के बारे में कल्पना तो करता ही था। लेकिन फिर फेसबुक इस दुनिया में आ गया। और मुझे एक बिलकुल नया तरीका मिल गया बाकि लड़कों को अनदेखा करने का और लड़कियों पर बुरी नज़र डालने का।
स्तन/ब्रेस्ट: कोई बड़ी बात नहीं
स्तन। मेरे किशोरावस्था के दौरान मैं ये शब्द ठीक से नहीं बोल पाता था। लेकिन अब नहीं। स्तन। देखा मैंने कह दिया। स्तन। स्तन। स्तन।
कुछ पुरुषों का कहना है की वो स्तन की वजह से असमंजस में पड़ जाते हैं। और कुछ पुरुष इनसे (स्तनों से) मनोग्राहित हैं। काफी अजीबो गरीब स्तिथि है न ये। क्यूंकि पोर्न फिल्मों के अलावा, मुझे आज तक ऐसी कोई महिला नहीं मिली है जिसे पुरुष के शरीर के किसी भी अंग को लेकर कोई ख़ास रूचि रखती हों। (विश्वास करो मेरा, वो झूठ बोल रही है)
लड़ाई बालों की: पुरुषों की बिकनी वेक्स
क्या मेट्रोसेक्शूऐलिटी अपने चरम के बाद भी अब तक एक जूनून है?
भारत की शहरी महिलाओं को ज़रूर ऐसा लगता है। मेरी आज़ाद ख्यालों वाली गर्ल फ्रेंड को भी मेरे मेनीक्युर/पैय्डीक्युर कराना पसंद नहीं। खासकर जब मैं उसके माता पिता से मिलने जाता हूँ। यह काफी दुखद है, इस बात को ध्यान में रखते हुए की मैं मेट्रोसेक्शूऐलिटी के नाम पर अक्सर टाइट जींस और गुलाबी कमीज़ पहना करता हूँ। (पड़ोस का समलैंगिक लड़का पढ़े)
बुरा' यमला पगला दीवाना
पिछले हफ्ते मुझे एक क्रोधित महिला की फटकार ट्विट्टर के ज़रिये सुनने को मिली, जिसका कहना था की दिल्ली के सभी पुरुष घटिया हैं।
मेरी ट्विट्टर की साथी महिला की सोच वाकई पुरातन है। अच्छा मज़ाक छोड़कर ज़रा संजीदा बात करते हैं। शायद मेरे शब्द अनुचित लगे लेकिन शायद इस महिला ने किसी दिल्ली के पुरुष से धोखा खाया था।
चुम्बन को लेकर हु-हल्ला!
बीते हफ्ते मैंने सार्वजानिक स्थानों पर प्रेम प्रदर्शन के बारे में अपनी राय व्यक्त की और बदले में मेरी राय से नाराज़ महिलाओं की क्रोधपूर्वक टिप्पणियों की बौछार सी हो गयी। उनके अनुसार असली परेशानी सार्वजानिक स्थान नहीं बल्कि चुम्बन है। या शायद चुम्बन की गुणवत्ता।
तो स्वागत है आपके इस 'यमला पगला दीवाना' की चुम्बन की कुंजी में। शायद आपको लगे की आज का लेख पड़ोस वाली लड़की के लिए महतवपूर्ण है, लेकिन असल में यह आपके जीवन को बेहतर बनाने के लिए है।
सेक्स को गुप्त ना रखें
क्या आपने कभी अपनी माशूका को सार्वजानिक स्थान पर चुम्बन दिया है? अच्छा लगा? नहीं? ज़्यादा इसलिए क्यूंकि ऐसा करना सामाजिक रूप से निशब्द है?
शादी के अलावा लड़के और लड़की के रिश्तों को भारत में आसान नहीं माना जाता। हाँ, पहले की तुलना में अब प्रेम सम्बन्ध और विवाहपूर्व साथ रहने की बातें अब आम हो गयी हैं। लेकिन भारत का समाज ऐसे संबंधों के लिए मुश्किल ही साबित होता है।
अकेले ना रहने के पांच कारण
अध्याय २:१८ में भगवान् ने कहा है, "अकेलापन किसी भी इंसान के लिए अच्छा नहीं है।" और मैं इस बात से सहमत हूँ।
लेकिन आज के आधुनिक युग में अकेलेपन की ही होड़ सी मची हुई है। आस पड़ोस में हर जगह सिर्फ अकेले लोग दिखाई देते हैं।
नियंत्रण महिलाओं के हाथ में
अनंतकाल से पुरूषों को प्रतिबद्धता से बचने वाला और हर घड़ी सिर्फ सेक्स के बारे में सोचने वाला माना जाता है। लेकिन क्यों?
क्या हमें प्रकृति ने ऐसा ही बनाया है? क्या महिलाएं अपने पक्ष का बचाव बेहतर रूप से कर पाती हैं? या ये मिथक है कि हम पुरूष अपने आपको रंगीन मिज़ाज़ कहलवाना पसंद करते हैं? मेरी राय में जवाब इन तीनों का मिश्रण है।
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